Shabri Dham Shivarinarayan – वो जगह जहाँ राम ने शबरी के बेर चखे, और मैंने दोस्ती की मिठास
नमस्ते दोस्तों! मैं हूँ अमित, जांजगीर का अपना खूबसूरत भारत वाला। जांजगीर-चांपा की उस माटी से, जहाँ खेतों में धान की सौंधी खुशबू और हवा में महानदी की कलकल घुली रहती है। आजकल सोशल मीडिया पर पहाड़ों और समंदर की चमक-दमक तो बहुत दिखती है, पर सुकून कहाँ मिलता है? सुकून मिलता है अपनी जड़ों में, उन रास्तों पर जो सीधे दिल तक उतर जाते हैं। और जब बात सुकून की हो, तो ज़ुबान पर सबसे पहला नाम आता है Shabri Dham Shivarinarayan।
भाई, ये नाम सुनते ही आँखों के सामने रामायण का वो ममता भरा प्रसंग तैर जाता है। माता शबरी के प्रेम से चखे हुए मीठे बेर, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम का वनवास और त्रिवेणी संगम (महानदी, शिवनाथ और जोंक) की गोद में बसी असीम शांति।
मैं तो कितनी ही बार वहाँ गया हूँ, खासकर अपने जिगरी यार नवीन के साथ। अपनी बाइक स्टार्ट की, जांजगीर से करीब 50 किलोमीटर की वो मस्त सड़क नापी, और निकल पड़े। रास्ते में कभी अचानक आई बारिश में भीगना, तो कभी चिलचिलाती धूप में किसी पेड़ की छाँव ढूँढना सफर का हर रंग देखा है। पर सच कहूँ, शिवरीनारायण पहुँचकर महानदी के घाट पर जैसे ही पैर रखो, सारी थकान हवा हो जाती है। लगता है जैसे सदियों पुराने किसी अपने ने गले लगा लिया हो।
तो बस, हाथ में चाय का गरम कुल्हड़ थाम लीजिए। यह कोई किताबी गाइड नहीं, बल्कि मेरे अपने दिल की डायरी के वो पन्ने हैं जिन्हें मैंने जिया है, जहाँ हँसी भी है और भीतर की शांति भी।
शिवरीनारायण सिर्फ एक तीर्थ ही नहीं, बल्कि हर प्रकृति प्रेमी के लिए एक अनदेखा सुकून है। इस पूरे सफर की असली कहानियाँ, गुप्त घाट, स्थानीय स्वाद और जांजगीर से वहाँ पहुँचने का सबसे आसान रास्ता सब कुछ आपके साथ खुलकर साझा करूँगा।
तैयार हैं? तो चलिए, शुरू करते हैं इस खूबसूरत सफर को!
Shabri Dham Shivarinarayan एडवेंचर: बाइक, बारिश और एक वादा

दोस्तों, Shabri Dham Shivarinarayan का मेरा वो पहला सफर किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था। बात 2018 की है। एक सुबह अचानक नवीन भाई का फोन घनघनाया “अमित, चल बाबू! आज शिवरीनारायण चलते हैं। शबरी माता के दर्शन करेंगे और महानदी के ठंडे पानी में पैर डुबोकर बैठेंगे।” मैंने थोड़ा झिझकते हुए पूछा, “ठीक है यार, पर क्या बाइक से?” वो ठहाका मार के बोला, “अरे हाँ भाई, थोड़ा एडवेंचर तो बनता है!”
सुबह की ताजी हवा में जांजगीर से हमारी बाइक रफ्तार पकड़ चुकी थी। दोनों तरफ लहलहाते हरे-भरे खेत और बीच-बीच में भाप उड़ाती चाय की टपरियाँ। सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट चल रहा था, लेकिन करीब आधे रास्ते पहुँचे ही थे कि आसमान ने करवट ली और झमाझम बारिश शुरू हो गई। वो मोटी-मोटी बूँदें, जो सीधा चश्मे पर आकर चिपक जाती हैं। हमारे पास कोई रेनकोट नहीं था, बस हाथ में एक पुराना थैला। भीगी, फिसलन भरी सड़क पर जब मुझे थोड़ा डर लगने लगा, तो नवीन ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे डर मत अमित! प्रभु राम तो पूरा वनवास जंगल-जंगल काट आए थे, हमें तो बस 50 किलोमीटर ही नापना है।”
पूरी तरह भीगते हुए जब हम मंदिर के द्वार पर पहुँचे, तो सामने का नजारा देखकर सारी ठिठुरन गायब हो गई। सामने खामोशी से बहती विशाल महानदी और पानी की ओर झुके हुए घने दरख्त, जैसे सदियों पुरानी कोई दास्तान सुना रहे हों। हमने पास की एक दुकान से फटाफट सूखे कपड़े लिए और सीधे 11वीं सदी के ऐतिहासिक शिवरीनारायण मंदिर की ओर बढ़ चले वही भव्य धाम, जिसे हैहय वंश के राजाओं ने बड़ी नक्काशी से तराशा था।
गर्भगृह में कदम रखते ही एक ऐसी असीम शीतलता महसूस हुई, मानो किसी अपने ने ममता से गले लगा लिया हो। मैंने नवीन से धीरे से कहा, “भाई, इस जगह में वाकई कोई जादू है।”
रामायण काल की वो पावन गाथा यहाँ की हवा में तैरती महसूस होती है। यही तो वो पावन धरा है जहाँ माता शबरी का आश्रम था, जहाँ एक बूढ़ी माँ के निश्छल प्रेम और जूठे बेरों का मान रखने खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम खिंचे चले आए थे। उस भक्ति और समर्पण को महसूस करके मेरी आँखें भर आईं। नवीन ने मेरा कंधा हिलाकर चुटकी ली, “अरे पगले, रो बाद में लेना, पहले हाथ जोड़कर दर्शन तो कर ले!” हम दोनों हँस पड़े, पर उस पल दिल के किसी कोने में एक गहरा ठहराव हमेशा के लिए बस गया।
उस शाम हमने घाट की सीढ़ियों पर घंटों बिताए। मंदिर की दिव्य आरती की गूँज, महानदी का निर्मल, ठंडा स्पर्श और ढलते सूरज की लालिमा। लौटते वक्त नवीन ने नदी किनारे से एक चिकना पत्थर उठाकर मेरी हथेली पर रख दिया और बोला “ये ले, आज के दिन की यादगार।”
हम थके हुए जरूर लौटे थे, पर दिल पूरी तरह तृप्त था। उस दिन के बाद से शिवरीनारायण जाना मेरी ज़िंदगी का एक अटूट नियम बन गया कभी यार-दोस्तों के साथ, तो कभी खुद से मिलने अकेले।
Shabri Dham Shivarinarayan History

अब थोड़ा संजीदा होकर दिल की गहराइयों में उतरते हैं यार। Shabri Dham Shivarinarayan सिर्फ नक्शे पर बना कोई आम कस्बा नहीं है, बल्कि यह खुली आँखों से देखा जाने वाला रामायण का एक जीवंत अध्याय है। इसका नाम ही शबरी-नारायण के पावन मिलन से पड़ा है। लोकमान्यता है कि इसी पावन धरा पर माता शबरी का वास था।
वनवास के दिनों का वो दृश्य तो हम सबके ज़ेहन में हमेशा जिंदा रहता है जब एक सरल भीलनी अपने प्रभु के लिए एक-एक बेर चखकर रखती है कि कहीं कोई फल खट्टा न निकल जाए। “प्रभु, मैंने चख लिया है, जो सबसे मीठा है वही आपके लिए लाई हूँ।” और मर्यादा पुरुषोत्तम राम बिना किसी हिचक के उन जूठे बेरों को अमृत समझकर स्वीकार करते हैं और कहते हैं, “माता, आपकी यह निश्छल भक्ति ही संसार का सबसे बड़ा प्रसाद है।”
Shivarinarayan की हवा आज भी उसी अलौकिक प्रेम और समर्पण की गवाही देती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार शबरी माता के पिता राजा शबर ने सदियों पहले यहाँ मंदिर की नींव रखी थी। ऐतिहासिक कालखंडों पर भले ही विद्वानों की अलग-अलग राय हो, लेकिन 11वीं सदी का कलचुरि कालीन लक्ष्मीनारायण मंदिर आज भी अपनी बेजोड़ स्थापत्य कला के साथ सीना ताने खड़ा है।
जब भी मैं महानदी के किनारे इस प्राचीन नगर में कदम रखता हूँ, तो रूह तक यह अहसास उतर जाता है कि यह माटी कितनी पुरानी और पूज्य है। जांजगीर-चांपा के इस अंचल में आज भी शाम ढलते ही चौपालों पर रामकथा की चौपाइयाँ गूँज उठती हैं।
ऐसी ही एक यात्रा में जब मैं नवीन के साथ घाट के किनारे टहल रहा था, तो एक बुजुर्ग बाबा मिले। उन्होंने सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बड़े भावुक स्वर में कहा, “बेटा, यही वो पावन धरती है जहाँ राघव के चरण पड़े थे। शबरी दाई की कुटिया के चिन्ह आज भी मौजूद हैं।” उनकी बात सुनकर हम ढूंढते हुए मुख्य परिसर के पास बने शबरी मंदिर पहुँचे। गर्भगृह में प्रभु राम, भ्राता लक्ष्मण और सामने हाथ जोड़े बैठी माता शबरी की प्रतिमा को देखकर रोंगटे खड़े हो गए। ऐसा लगा मानो किसी टाइम मशीन में बैठकर हम सीधे त्रेतायुग के उस शांत आश्रम में पहुँच गए हों। इतिहास और पुरातत्व में दिलचस्पी रखने वालों के लिए तो यह जगह किसी खुली किताब जैसी है।
शिवरीनारायण केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक-संस्कृति की धड़कन है। माघी पूर्णिमा का भव्य मेला हो या यहाँ के पारंपरिक उत्सव, हर रंग में रामायण की वही आत्मीयता रची-बसी दिखती है।
हालाँकि इस गहरी आस्था के बीच भी नवीन अपनी मस्ती से बाज नहीं आता। उस दिन मंदिर से बाहर निकलते हुए धीरे से बोला, “अमित भाई, प्रभु राम के समय अगर बुलेट होती ना, तो दंडकारण्य के जंगलों को नापना कितना आसान हो जाता!” उसकी बात पर हम दोनों खुलकर हँस पड़े। पर सच कहूँ दोस्तों, इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में शिवरीनारायण वह तिलिस्मी कोना है, जहाँ पहुँचकर समय की रफ्तार खुद-ब-खुद थम जाती है।
Shabri Dham Shivarinarayan में मन्दिरों की सैर
चलो दोस्तों, अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं और इस पावन परिसर के मंदिरों की सैर करते हैं।
शिवरीनारायण मंदिर परिसर किसी साधारण तीर्थ जैसा नहीं है, यहाँ हर कोने में इतिहास और आस्था का एक अलग ही संगम देखने को मिलता है। इस पूरे परिसर का केंद्रबिंदु है महानदी के पावन तट पर स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर (Laxminarayan Temple)। वैष्णव स्थापत्य शैली में तराशा गया यह मंदिर प्राचीन शिल्पकला का अद्भुत नमूना है। इसके पत्थरों पर उकेरी गई बारीक नक्काशी और रामायण कालीन प्रसंगों की मूर्तियाँ देखते ही बनती हैं। गर्भगृह के भीतर कदम रखते ही जो अलौकिक शांति मिलती है, उसे लफ्ज़ों में बयां करना मुश्किल है। खासकर यदि आप सुबह की मंगला आरती के समय वहाँ पहुँच जाएँ, तो शंख और घंटियों की गूँज सीधे रोंगटे खड़े कर देती है।
मुझे याद है, एक बार मैं भोर में 5 बजे ही नवीन के कमरे पर धमक गया था। रजाई खींचते हुए बोला, “उठ भाई, ये आरती छूट गई तो पछताएगा!” नींद में पहले तो उसने दो-चार खरी-खोटी सुनाई, पर जब आरती के बाद बाहर निकला, तो मुस्कुराते हुए बोला “अमित, सच में नींद कुर्बान करना पूरी तरह वसूल हो गया!”
परिसर में आगे बढ़ें तो Shabri Dham Shivarinarayan माता शबरी के असीम प्रेम की गवाही देता है। यहाँ भगवान विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप के साथ माता शबरी की प्रतिमा विराजमान है। मंदिर की दीवारों पर बने भित्तिचित्र उस युग की पावन गाथाओं को जीवंत कर देते हैं। ठीक पास में ही प्रभु के आज्ञाकारी अनुज को समर्पित लक्ष्मण मंदिर है आकार में भले ही छोटा, पर इसकी आध्यात्मिक ऊर्जा बहुत गहरी महसूस होती है। वहीं पास में माँ आदिशक्ति को समर्पित दंतेश्वरी मंदिर भी स्थित है, जहाँ माता के दर्शन कर मन पूरी तरह शांत हो जाता है।
- छत्तीसगढ़ के इस खूबसूरत मंदिर को भी देख सकते हैं – Dongargarh Mandir: क्यों हर साल लाखों लोग जाते हैं डोंगरगढ़?
एक दोपहर हमने पूरे परिसर का कोना-कोना पैदल नापा। पत्थरों पर सदियों पुरानी शिल्पकला को निहारते हुए नवीन ने एकदम सटीक बात कही थी, “अमित भाई, यह कोई मंदिर परिसर नहीं, बल्कि खुली हवा में साँस लेता एक जीवंत संग्रहालय है।”
अगर आपको फोटोग्राफी का शौक है, तो इन प्राचीन पत्थरों पर उकेरी गई रामायण की गाथाओं और वास्तुकला के बेजोड़ फ्रेम आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे। यात्रा से जुड़ी अधिक आधिकारिक जानकारी और रूट मैप के लिए आप Chhattisgarh Tourism का पोर्टल भी देख सकते हैं। बस एक बात का हमेशा ध्यान रखें यह एक अत्यंत पावन और जाग्रत तीर्थ है, इसलिए यहाँ की गरिमा, शांति और मर्यादा का पूरा सम्मान करें।
Shivrinarayan कैसे पहुँचें – सबसे आसान रूट और ट्रैवल टिप्स
कहानियाँ और इतिहास तो बहुत हो गए, अब थोड़ी प्रैक्टिकल बात कर लेते हैं कि आखिर यहाँ पहुँचना कैसे है।
अगर आप जांजगीर-चांपा के लोकल हैं, तो शिवरीनारायण का सफर एकदम मक्खन है। लेकिन अगर आप छत्तीसगढ़ के बाहर या किसी दूसरे शहर से आ रहे हैं, तब भी यहाँ पहुँचना बेहद आसान है।
- अपनी बाइक या कार से: NH-49 और स्टेट हाईवे से होते हुए लगभग 1 से 1.5 घंटे का समय लगता है। सुबह-सुबह ठंडी हवा के बीच निकलिए, रास्ते में हरे-भरे खेत और चाय की टपरियाँ आपका सफर यादगार बना देंगी। सड़क की हालत काफी अच्छी है, बस बरसात के मौसम में थोड़ा संभलकर चलें।
- लोकल बस सेवा: जांजगीर बस स्टैंड से शिवरीनारायण के लिए नियमित बसें चलती हैं। सफर में लगभग 1.5 से 2 घंटे लगते हैं और एक तरफ का किराया मात्र ₹50 से ₹100 के बीच रहता है।
- प्राइवेट टैक्सी/कैब: यदि आप पूरे परिवार या बच्चों के साथ जा रहे हैं, तो जांजगीर से सीधी टैक्सी बुक करना सबसे आरामदायक विकल्प है। राउंड ट्रिप का किराया अमूमन ₹1,200 से ₹1,800 तक रहता है।
दूसरे शहरों या राज्यों से आने वालों के लिए
- हवाई मार्ग (By Air): सबसे नजदीकी हवाई अड्डा स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट, रायपुर (RPR) है, जो यहाँ से लगभग 120 किमी दूर है। एयरपोर्ट से सीधी टैक्सी या बिलासपुर होते हुए बस आसानी से मिल जाती है।
- रेल मार्ग (By Train): सबसे प्रमुख और नजदीकी बड़ा रेलवे जंक्शन Bilaspur Junction है, जो लगभग 60 किमी की दूरी पर है। दूसरा विकल्प चांपा जंक्शन या जांजगीर नैला स्टेशन है, जहाँ से लोकल गाड़ियाँ और बसें हर समय उपलब्ध रहती हैं।
मैं और नवीन तो हमेशा बाइक से ही निकलना पसंद करते हैं खुली हवा, मनपसंद गाने और आज़ादी का अहसास ही अलग होता है। लेकिन हाँ, एडवेंचर अपनी जगह और सुरक्षा अपनी जगह; हेलमेट लगाना कभी मत भूलिएगा!
बेस्ट टाइम – कब जाओ, कब ना जाओ
- अक्टूबर से मार्च (बेस्ट टाइम): मौसम एकदम सुहाना और ठंडा रहता है। सर्दियों की सुबह जब महानदी पर हल्का कोहरा छाया रहता है, तो नजारा बिल्कुल जादुई लगता है। घूमने और सुकून से घाट पर बैठने के लिए यह सबसे बेहतरीन समय है।
- अप्रैल से जून (गर्मियाँ – Avoid करें): इस दौरान छत्तीसगढ़ की कड़क धूप और उमस पसीने छुड़ा देती है। दोपहर में मंदिर के पत्थरों पर चलना मुश्किल हो जाता है, इसलिए गर्मियों में जाने से बचें।
- जुलाई से सितंबर (मानसून – एडवेंचर): चारों तरफ हरियाली छा जाती है और महानदी पूरे उफान पर होती है। नजारा देखने लायक होता है, पर बारिश में सड़कें फिसलन भरी हो जाती हैं। मैं एक बार जुलाई में गया था, महानदी का रौद्र रूप देखकर मजा तो बहुत आया, लेकिन नवीन ने कान पकड़कर कहा था अमित भाई, अगली बार सर्दियों की गुनगुनी धूप में कुल्हड़ वाली चाय पीते हुए ही चलेंगे!
- त्योहार और मेले (माघी पूर्णिमा, रामनवमी, दिवाली): इस दौरान भीड़ काफी बढ़ जाती है, लेकिन मंदिर की रौनक, रोशनी और ऊर्जा का माहौल अलग ही लेवल पर होता है।
सीधी बात कहूँ तो एक शानदार और आरामदायक ट्रिप के लिए अपनी बाइक अक्टूबर से फरवरी के बीच ही निकालें!
शिवरीनारायण में क्या करें | Things to Do
शिवरीनारायण में सुकून से वक्त बिताने, एडवेंचर करने और मन को तरोताजा करने के लिए कई बेहतरीन चीज़ें हैं:
- मंदिर दर्शन और पूजा: सुबह या शाम के वक्त मुख्य लक्ष्मीनारायण और शबरी मंदिर में दर्शन करें। शांत मन से हाथ जोड़कर प्रार्थना करने पर भीतर एक अलग ही ऊर्जा और सकारात्मकता महसूस होती है।
- महानदी घाट पर सुस्ताएं और पिकनिक मनाएं: नदी की ठंडी लहरों में पैर डुबोकर बैठें और उड़ते हुए परिंदों को निहारें। यहाँ मछली पकड़ना मना है, लेकिन आप किनारे बैठकर शांति से समय बिता सकते हैं। एक बार हम घर से दाल-चावल पैक कराकर ले गए थे; घाट की सीढ़ियों पर बैठकर खाते हुए नवीन बड़े दार्शनिक अंदाज में बोला था “अमित, वनवास के दिनों में प्रभु राम भी नदी किनारे ऐसे ही सादा भोजन करते होंगे!”
- लोकल ‘मिनी गोवा’ वाइब्स: त्रिवेणी संगम के पास रेतीले किनारे और पानी का फैलाव देखकर सच में गोवा वाले बीच जैसी फीलिंग आ जाती है। रेत पर टहलना, सनसेट देखना और दोस्तों के साथ तस्वीरें खिंचवाना यह जगह यूथ के लिए एकदम मिनी गोवा का अहसास कराती है।
- महानदी का ‘अमेज़न टूर’ (बोटिंग एडवेंचर): जब महानदी और आसपास की हरियाली के बीच नाव आगे बढ़ती है, तो दोनों तरफ घने पेड़ और शांत पानी देखकर लगता है जैसे छत्तीसगढ़ के अपने ‘अमेज़न जंगल’ की सैर पर निकले हों। नवीन ने तो नाव में बैठकर ही चिल्लाना शुरू कर दिया था “अमित भाई, आज अपन डिस्कवरी चैनल वाले बन गए हैं!”
- लोकल मार्केट और शॉपिंग: मंदिर के बाहर स्थानीय बाजार से छत्तीसगढ़ी हस्तशिल्प और कोसा सिल्क की साड़ियाँ देख सकते हैं। वैसे खरीददारी में थोड़ा ध्यान रखें नवीन ने बड़े चाव से मिट्टी की एक खूबसूरत मूर्ति ली थी, जो घर की दहलीज पर कदम रखते ही हाथ से छूटकर टूट गई!
- शाम की महाआरती और सनसेट: ढलते सूरज की सुनहरी किरणों के बीच जब शंख-घंटियों के साथ संध्या आरती शुरू होती है, तो वो नजारा वाकई रूहानी और जादुई बन जाता है।
- ध्यान और आत्मिक शांति: किसी शांत कोने में बैठकर कुछ देर ध्यान लगाएँ। यहाँ की हवा में रची-बसी माता शबरी की भक्ति और समर्पण की कहानी आपको भीतर तक एक गहरा सुकून दे जाएगी।
शिवरीनारायण के आसपास की जगहें – 1 दिन में पूरा टूर
भाई, अगर आपके पास एक दिन का समय है और आप Shabri Dham Shivarinarayan के साथ-साथ आसपास के नगीने भी एक्सप्लोर करना चाहते हैं, तो जांजगीर-चांपा का यह इलाका इतिहास और नेचर का जबरदस्त कॉम्बो है।
सुबह 8 बजे शिवरीनारायण से निकलो और शाम 6-7 बजे तक ये शानदार स्पॉट्स आराम से कवर हो जाते हैं:
- विष्णु मंदिर, जांजगीर (45 किमी): 12वीं सदी का नक्काशीदार ऐतिहासिक मंदिर, जिसे ‘भीमा तिगड़ा’ भी कहते हैं। इसकी वास्तुकला देखकर इतिहास प्रेमी दंग रह जाते हैं।
- प्रेम मंदिर, जांजगीर (45 किमी): शहर के बीचों-बीच स्थित एक शांत और नयनाभिराम आध्यात्मिक केंद्र, जहाँ का सुव्यवस्थित परिसर मन को असीम शांति देता है।
- कोटमी सोनार क्रोकोडाइल पार्क (40 किमी): एशिया के चुनिंदा प्राकृतिक मगरमच्छ संरक्षण केंद्रों में से एक। बड़े से तालाब में तैरते और धूप सेकते दर्जनों मगरमच्छ देखना बच्चों और बड़ों दोनों के लिए थ्रिलिंग अनुभव है।
- लिंगेश्वर मंदिर, नवागढ़ (22 किमी): शिवरीनारायण के बिल्कुल पास स्थित यह प्राचीन शिव धाम अपनी लोक-आस्था और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।
- बारनवापारा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी (70 किमी): अगर वाइल्डलाइफ और जंगल सफारी का असली रोमांच चाहिए, तो महानदी पार करके यहाँ का रुख करें। हिरन, गौर, सांभर और घने जंगलों के बीच बाइक या जिप्सी दौड़ाने का मजा ही अलग है।
1-डे क्विक प्लान: सुबह शिवरीनारायण दर्शन ➔ नवागढ़ (लिंगेश्वर मंदिर) ➔ दोपहर में कोटमी सोनार ➔ शाम को जांजगीर (विष्णु मंदिर व प्रेम मंदिर)।
फैमिली के साथ कार बेस्ट है, और दोस्तों के साथ बाइक पर यह एक परफेक्ट वीकेंड रोड-ट्रिप बन जाता है!
Shivrinarayan की वो यादें
यार, शिवरीनारायण की वो यादें तो ऐसी हैं कि आज भी जब आँखें मूँदता हूँ, तो महानदी की कलकल लहरों की आवाज़ सीधे रूह में गूँज उठती है।
वो पहली बार जब नवीन के साथ बाइक पर फिसलन भरे रास्तों को काटते हुए झमाझम बारिश में भीगे-भीगे पहुँचे थे, और मंदिर की चौखट पर माथा टेकते ही शबरी माता की निश्छल भक्ति को महसूस करके आँखें नम हो गई थीं। कभी हँसी-मज़ाक में बीच रास्ते बाइक का पंक्चर हो जाना और फिर मैकेनिक की टपरी पर कुल्हड़ वाली कड़क चाय के साथ घंटों ठहाके लगाना।
और वो शामें… जब कभी अकेले जाकर ढलते सूरज के बीच संध्या आरती देखी, तो दादाजी की बहुत याद आई। उस पल लगा मानो वो खुद पास खड़े होकर कंधे पर हाथ रख कह रहे हों “बेटा, ज़िंदगी की असली शांति बस यहीं है।”
भाई, यह पावन धरा सिर्फ प्राचीन पत्थरों और नक्काशी का ढेर नहीं है, बल्कि यह दिल के उन टूटे-बिखरे तारों को आपस में जोड़ देती है जो रोज़मर्रा की भागदौड़ में कहीं खो जाते हैं। एक बार तो हमने नदी किनारे छोटी सी अलाव सुलगाकर तारों की छाँव में रात भर रामकथा के भजन गुनगुनाए थे। सुबह जब सूरज की पहली किरण महानदी के पानी पर चमकी, तो लगा जैसे खुद राघवेंद्र सरकार ने आकर अपना वरदहस्त सिर पर रख दिया हो।
तो दोस्तों, अगर कभी शिवरीनारायण निकलो, तो सिर्फ तस्वीरें खींचने मत जाना, वहाँ ठहरना, उस हवा को महसूस करना और अपनी भी कुछ ऐसी ही अनमोल यादें बुनना… वरना मेरी ये कहानियाँ सुन-सुनकर ही मीठी जलन होती रहेगी!
जाओ ना यार, दिल से
दोस्तों, Shabri Dham Shivarinarayan बाहर से जितना सीधा-सादा और शांत दिखता है, भीतर से उतना ही गहरा और रूहानी है। सीधे शब्दों में कहूँ तो यह हमारे खूबसूरत भारत का वो अनदेखा चमकता रत्न है, जहाँ एक बार कदम रख दो तो मन का कोलाहल हमेशा के लिए थम जाता है।
मैं, आपका अपना अमित, जांजगीर की इस पावन माटी से आप सभी को पूरे दिल से न्योता देता हूँ। अपनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी से एक दिन चुराइए और महानदी के इस पावन तट पर सुकून के दो पल बिताकर देखिए।
नवीन और मैं तो बहुत जल्द अपनी अगली बाइक ट्रिप का प्लान बना रहे हैं तो बताओ यार, कौन-कौन हमारे साथ इस सफर पर चलने को तैयार है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय और अनुभव जरूर साझा करना।
अगर मेरी ये दिल से निकली कहानियाँ आपको पसंद आई हों, तो अपने दोस्तों और परिवार के साथ इसे शेयर करना मत भूलना। अपने देश के ऐसे ही छुपे हुए कोनों और अनकही दास्तानों को जानने के लिए खूबसूरत भारत के साथ जुड़े रहिए।
खुश रहिए, घूमते रहिए और अपनी जड़ों से जुड़े रहिए।
जय श्री राम!





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